1️⃣ प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period)
🔹लांजी क्षेत्र नर्मदा घाटी से सटा हुआ है, जो भारत की सबसे पुरानी मानव सभ्यताओं में से एक का केंद्र रहा है।
🔹नर्मदा घाटी में मानव अस्तित्व के प्रमाण 10,000 वर्ष पहले के भी मिले हैं।
🔹यहाँ पाषाण युग (Stone Age) के औजार और गुफा चित्र (Cave Paintings) मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र आदिमानवों का निवास था।
2️⃣ सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक काल (Indus Valley & Vedic Age)
🔹लांजी क्षेत्र भले ही सीधे सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1300 BCE) का हिस्सा न रहा हो, लेकिन व्यापारिक मार्गों से इसका जुड़ाव रहा होगा।
🔹वैदिक काल (1500-500 BCE) में आर्यों का विस्तार इस क्षेत्र तक हुआ होगा और यहाँ कृषि और पशुपालन को बढ़ावा मिला।
🔹इस काल में वैदिक रीति-रिवाजों, यज्ञों और कर्मकांडों का प्रभाव बढ़ने लगा।
3️⃣ महाजनपद काल (6वीं - 4वीं शताब्दी ईसा पूर्व)>
🔹 इस समय लांजी क्षेत्र संभवतः अवन्ती महाजनपद या विदर्भ क्षेत्र के अंतर्गत आता था।
🔹यह प्राचीन व्यापार मार्गों से जुड़ा था, जहाँ वस्त्र, धातु और कृषि उत्पादों का आदान-प्रदान होता था।
🔹 बौद्ध धर्म और जैन धर्म का प्रभाव इस काल में दिखने लगा था।
4️⃣ मौर्य और गुप्त काल (3री शताब्दी ईसा पूर्व - 6वीं शताब्दी)
🔹 चंद्रगुप्त मौर्य (321-297 BCE) के समय यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बना।
🔹 सम्राट अशोक (268-232 BCE) के शासनकाल में बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा, जिससे कई बौद्ध स्तूपों और मठों का निर्माण हुआ।
🔹गुप्त काल (319-550 CE) को "स्वर्ण युग" कहा जाता है, जब इस क्षेत्र में हिंदू संस्कृति, कला और मंदिर निर्माण का विकास हुआ।
5️⃣ प्रारंभिक मध्यकाल (7वीं - 9वीं शताब्दी)
🔹 इस काल में गोंड, नागवंशी और चालुक्य शासकों का प्रभाव रहा।
🔹 स्थानीय शासकों ने प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत की और किलों व मंदिरों का निर्माण करवाया।
🔹यह क्षेत्र व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा।
📜 निष्कर्ष
🔹 लांजी का इतिहास प्राचीन सभ्यता, महाजनपद, मौर्य और गुप्त काल से जुड़ा हुआ है।
🔹यहाँ व्यापार मार्ग, धार्मिक परिवर्तन, और सांस्कृतिक विकास हुआ।
🔹 कला, स्थापत्य, और प्रशासनिक सुधार इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से समृद्ध बनाते हैं।
कलचुरी वंश का शासन 9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच मध्य भारत के बड़े भाग पर फैला था। यह वंश दो प्रमुख शाखाओं में विभाजित था – त्रिपुरी (मध्य प्रदेश) के कलचुरी और रत्नपुर (छत्तीसगढ़) के कलचुरी। माना जाता है कि लांजी क्षेत्र रत्नपुर या त्रिपुरी शाखा के प्रभाव में रहा होगा।
🔹 राजधानी और प्रशासन
🔹 त्रिपुरी (वर्तमान जबलपुर) और रत्नपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) इनकी प्रमुख राजधानियाँ थीं।
🔹शासन प्रणाली संगठित थी और स्थानीय शासकों को अधिकार दिए गए थे।
🔹 लांजी क्षेत्र भी संभवतः एक प्रशासनिक इकाई रहा होगा।
🔹 संस्कृति और धर्म
🔹 कलचुरी शासक मुख्यतः शैव धर्म को मानते थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को भी संरक्षण दिया।
🔹 इस काल में शिव मंदिरों और अन्य हिंदू धार्मिक स्थलों का निर्माण हुआ।
🔹 गोंड और आदिवासी परंपराओं पर भी कलचुरी शासन का प्रभाव देखा जाता है।
🔹 स्थापत्य कला और किलेबंदी
🔹 कलचुरी वंश के शासकों ने शिव मंदिरों, जलाशयों, किलों और नगरों का निर्माण किया।
🔹 लांजी क्षेत्र में भी संभवतः इस काल में प्रारंभिक किलों और धार्मिक स्थलों का विकास हुआ।
🔹 उनके द्वारा बनवाए गए मंदिरों में intricate (जटिल) नक्काशी और अद्भुत वास्तुकला देखी जा सकती है।
🔹 युद्ध और सैन्य शक्ति
🔹 कलचुरी वंश ने चंदेल, परमार, चालुक्य और राष्ट्रकूट शासकों से कई युद्ध किए।
🔹 उनके पास एक शक्तिशाली घुड़सवार और हाथी सेना थी, जिससे उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
🔹 लांजी जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में किलों का निर्माण इसी कारण हुआ होगा।
🔹 कलचुरी वंश का पतन
🔹 12वीं शताब्दी में चेदि वंश के कलचुरी कमजोर पड़ने लगे।
🔹चंदेलों, परमारों और बाद में दिल्ली सल्तनत के हमलों से इनका पतन हो गया।
🔹 13वीं शताब्दी में यह क्षेत्र गोंड राजाओं के अधीन आने लगा।
📜 निष्कर्ष
✅ कलचुरी वंश ने मध्य भारत में हिंदू संस्कृति, स्थापत्य कला और प्रशासन को विकसित किया।
✅ लांजी क्षेत्र संभवतः कलचुरी राजाओं के अधीन रहा, जहाँ किले और धार्मिक स्थल बने।
✅ 12वीं शताब्दी के बाद कलचुरी वंश कमजोर हुआ और नए स्थानीय राजवंश उभरने लगे।
12वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान, लांजी क्षेत्र पर विभिन्न राजपूत राजवंशों का प्रभाव रहा। इस काल में चंदेल, परमार, सोलंकी और गहरवार जैसे प्रमुख राजपूत वंशों का दबदबा था। इन शासकों ने अपनी सैन्य शक्ति को संगठित किया, प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मजबूत किया और किलों एवं मंदिरों का निर्माण कराया।
🔹 प्रमुख राजवंश और प्रशासन
🔹 इस काल में चंदेल और परमार राजाओं का मध्य भारत और बुंदेलखंड क्षेत्र में शासन था।
🔹राजपूत शासकों ने लांजी और आसपास के क्षेत्रों में अपनी सत्ता को मजबूत किया।
🔹स्थानीय ज़मींदार और ठाकुरों को प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ दी गईं।
🔹 स्थापत्य कला और किलाबंदी
🔹 इस काल में राजपूत स्थापत्य शैली में कई मंदिरों और दुर्गों का निर्माण हुआ।
🔹लांजी क्षेत्र में भी इस समय प्राचीन किलों और किलेबंदी का विकास हुआ होगा।
🔹मंदिरों में intricate (सूक्ष्म) नक्काशी, ऊँचे शिखर और विस्तृत मंडपों की झलक मिलती है।
🔹 युद्ध और संघर्ष
🔹12वीं शताब्दी में गज़नवी और गोरी आक्रमणों के कारण राजपूत शासकों को कई युद्ध लड़ने पड़े।
🔹दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ, कई राजपूत शासकों ने अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए संघर्ष किया।
🔹इस क्षेत्र में भी मुस्लिम आक्रमणों से रक्षा के लिए मजबूत किलों का निर्माण किया गया।
🔹 संस्कृति और धर्म
🔹राजपूत शासकों ने शिव, विष्णु और देवी मंदिरों का निर्माण कराया।
🔹इस काल में क्षत्रिय वीरता, सम्मान और भक्ति पर आधारित साहित्य की रचना हुई।
🔹 युद्ध और प्रशासन के साथ-साथ, कला और संगीत को भी बढ़ावा दिया गया।
🔹 राजपूत शासन का पतन
🔹 13वीं और 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के बढ़ते प्रभाव के कारण राजपूत सत्ता कमजोर होने लगी।
🔹 कई राजपूत शासकों ने मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध वीरतापूर्ण संघर्ष किया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति क्षीण हो गई।
🔹 14वीं शताब्दी के अंत तक, यह क्षेत्र दिल्ली सल्तनत और अन्य शक्तियों के अधीन आ गया।
📜 निष्कर्ष
✅ राजपूत शासकों ने लांजी क्षेत्र में प्रशासनिक, सैन्य और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा दिया।
✅ इस काल में मंदिरों, किलों और प्रशासनिक संरचनाओं का विकास हुआ।
✅ 14वीं शताब्दी के अंत में दिल्ली सल्तनत के प्रभाव से राजपूत सत्ता कमजोर हो गई।
14वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान, लांजी क्षेत्र गोंड राजाओं के अधीन रहा। गोंड शासनकाल में इस क्षेत्र में सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक विकास हुआ। गोंड शासकों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता को बनाए रखा और किलों एवं मंदिरों का निर्माण किया।
🔹 प्रमुख गोंड शासक और प्रशासन
🔹 गोंड शासकों ने गढ़-कटंगा प्रणाली के तहत अपने राज्य को छोटे प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया।
🔹इस समय प्रमुख गोंड राज्य गढ़-मंडला, देवगढ़, चौरागढ़ और चंदा रहे।
🔹 गोंड राजाओं ने स्थानीय सामंतों और सरदारों को अधिकार सौंपे, जिससे कुशल प्रशासन चला।
🔹 किलों और स्थापत्य कला का विकास
🔹 गोंड राजाओं ने लांजी किला और कई अन्य सुरक्षा स्थलों का निर्माण करवाया।
🔹 किलों का निर्माण सुरक्षा और प्रशासन के लिए किया गया था।
🔹इस काल में गोंड स्थापत्य कला का प्रभाव देखने को मिलता है।
🔹 समाज और अर्थव्यवस्था
🔹 गोंड शासनकाल में कृषि, वनोपज और व्यापार को बढ़ावा दिया गया।
🔹 लांजी क्षेत्र में धान, तिलहन और अन्य फसलों की खेती होती थी।
🔹 गोंड समाज सामूहिक जीवनशैली पर आधारित था और उन्होंने अपनी संस्कृति एवं परंपराओं को बनाए रखा।
🔹 धर्म और संस्कृति
🔹 गोंड शासकों ने प्राकृतिक पूजन परंपरा को बढ़ावा दिया।
🔹 इस काल में गोंड देवता जैसे बड़ा देव की पूजा की जाती थी।
🔹हिंदू धर्म और लोक संस्कृति का समावेश भी हुआ, जिससे मंदिरों और स्थानीय धार्मिक स्थलों का निर्माण हुआ।
🔹 युद्ध और मुगलों से संघर्ष
🔹 16वीं और 17वीं शताब्दी में गोंड राज्यों पर मुगल और मराठा आक्रमण हुए।
🔹गोंड राजा रानी दुर्गावती (1534-1564) ने मुगलों के खिलाफ वीरतापूर्वक संघर्ष किया।
🔹औरंगजेब के शासनकाल में गोंड राज्यों पर दबाव बढ़ गया, लेकिन गोंड शासकों ने कई वर्षों तक अपनी सत्ता बनाए रखी।
🔹 गोंड शासन का पतन
-🔹18वीं शताब्दी में गोंड शासकों की शक्ति कमजोर होने लगी।
🔹 मराठाओं ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण करना शुरू किया, जिससे गोंड शासन धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
🔹 अंततः लांजी क्षेत्र मराठाओं और बाद में ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया।
📜 निष्कर्ष
✅ गोंड शासकों ने लांजी क्षेत्र में स्थापत्य, प्रशासन और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा दिया।
✅ इस काल में मजबूत किले और मंदिरों का निर्माण हुआ।
✅ गोंड शासकों ने मुगलों और मराठाओं के विरुद्ध वीरतापूर्वक संघर्ष किया।
✅ 18वीं शताब्दी में मराठा आक्रमण के कारण गोंड शासन कमजोर पड़ गया।
18वीं शताब्दी में लांजी क्षेत्र मुगल और मराठा साम्राज्यों के बीच संघर्ष का केंद्र बन गया। इस दौरान गोंड शासकों की सत्ता कमजोर पड़ने लगी और बाहरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा।
🔹 मुगलों का प्रभाव
🔹 17वीं शताब्दी के अंत और 18वीं शताब्दी की शुरुआत में मुगलों ने गोंड राज्यों पर कब्जा करने का प्रयास किया।
🔹 औरंगजेब (1658-1707) के शासनकाल में मुगल सेनाओं ने गढ़-मंडला और आसपास के क्षेत्रों पर आक्रमण किए।
🔹 मुगल प्रशासन ने जमींदारी और कर संग्रह को बढ़ाया, जिससे स्थानीय शासकों और जनता पर दबाव बढ़ा।
🔹मुगलों ने गोंड राजाओं की शक्ति को कमजोर किया, जिससे इस क्षेत्र में अस्थिरता आई।
🔹 मराठाओं का उदय
🔹 18वीं शताब्दी की शुरुआत में मराठा साम्राज्य शक्तिशाली होने लगा और उन्होंने मुगलों के विरुद्ध विद्रोह किया।
🔹पेशवा बाजीराव प्रथम (1720-1740) और उसके बाद के मराठा शासकों ने मालवा और विदर्भ क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की।
🔹1740 के बाद, मराठाओं ने इस क्षेत्र में कई सैन्य अभियानों का संचालन किया और लांजी सहित गोंड राज्यों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
🔹 मराठाओं द्वारा प्रशासनिक सुधार
🔹मराठाओं ने इस क्षेत्र में सुरक्षा और प्रशासन को पुनर्गठित किया।
🔹 उन्होंने कर प्रणाली में सुधार किया और व्यापार को बढ़ावा दिया।
🔹 स्थानीय जमींदारों और सरदारों को मराठा प्रशासन के अधीन कर दिया गया।
🔹 युद्ध और विद्रोह
🔹 गोंड शासकों और स्थानीय नेताओं ने मराठाओं और मुगलों के खिलाफ कई बार विद्रोह किया।
🔹1760 के दशक में गोंडों ने लांजी और आसपास के क्षेत्रों में मराठाओं के विरुद्ध संघर्ष किया, लेकिन उन्हें दबा दिया गया।
🔹 18वीं शताब्दी के अंत तक यह क्षेत्र मराठा नियंत्रण में पूरी तरह आ गया।
🔹 सांस्कृतिक प्रभाव
🔹 मराठा शासनकाल में इस क्षेत्र में मराठी संस्कृति और प्रशासनिक शैली का प्रभाव बढ़ा।
🔹 मराठाओं ने स्थानीय मंदिरों और धार्मिक स्थलों को पुनर्निर्मित करवाया।
🔹 व्यापार और शिल्पकला को बढ़ावा देने के प्रयास किए गए।
🔹 ब्रिटिश प्रभाव की शुरुआत
🔹 18वीं शताब्दी के अंत तक मराठाओं और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष शुरू हो गया।
🔹 1800 के आसपास अंग्रेजों ने धीरे-धीरे मराठा नियंत्रण को चुनौती देना शुरू कर दिया।
🔹इसके परिणामस्वरूप 19वीं शताब्दी में यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया।
📜 निष्कर्ष
✅ 18वीं शताब्दी में मुगलों और मराठाओं के बीच लांजी क्षेत्र संघर्ष का केंद्र बना।
✅ मराठाओं ने इस क्षेत्र में प्रशासनिक और सैन्य सुधार किए।
✅ स्थानीय गोंड शासकों ने विद्रोह किया, लेकिन अंततः मराठाओं ने शासन स्थापित किया।
✅ 18वीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटिश प्रभाव बढ़ने लगा, जो आगे चलकर ब्रिटिश शासन में परिवर्तित हुआ।
🔹1818 में तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध के बाद मराठाओं की हार हुई, और लांजी क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन आ गया।
🔹 ब्रिटिश सरकार ने यहाँ प्रशासनिक और कानूनी सुधार लागू किए, लेकिन कर प्रणाली कठोर थी, जिससे किसानों और जमींदारों पर भारी बोझ पड़ा।
🔹1857 के सिपाही विद्रोह (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) के दौरान यह क्षेत्र भी विद्रोह से प्रभावित रहा। स्थानीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया।
🔹महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के नेतृत्व में देशव्यापी स्वतंत्रता संग्राम में लांजी और इसके आसपास के लोग भी शामिल हुए।
🔹 1942 के "भारत छोड़ो आंदोलन" में स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों ने भाग लिया।
🔹15 अगस्त 1947 को भारत की आज़ादी के बाद, लांजी को मध्य प्रांत और बरार (Central Provinces and Berar) से विलय कर मध्य प्रदेश का हिस्सा बना दिया गया।
🔹1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग के तहत लांजी को आधिकारिक रूप से मध्य प्रदेश राज्य में शामिल किया गया।
🔹आज़ादी के बाद क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ।
🔹कृषि और लघु उद्योगों का विकास हुआ, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिला।
🔹21वीं शताब्दी में लांजी में डिजिटल युग, व्यापारिक उन्नति और राजनीतिक गतिविधियों का विकास हुआ।
🔹 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में और लांजी के विधायक राजकुमार कर्राहे की अगुवाई में लांजी हर क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है।